भजन

हे कृष्ण गोपाल हरि हे दीन दयाल हरि: भजन (Hey Krishna Gopal Hari)

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हे कृष्ण गोपाल हरि,
हे दीन दयाल हरि,
हे कृष्ण गोपाल हरी,
हे दीन दयाल हरि,
हे कृष्ण गोपाल हरी,
हे दीन दयाल हरि ॥

तुम करता तुम ही कारण,
परम कृपाल हरी,
हे दीन दयाल हरि,
हे कृष्ण गोपाल हरी,
हे दीन दयाल हरि ॥

रथ हाके रणभूमि में,
और कर्म योग के मर्म बताये,
अजर अमर है परम तत्व यूँ,
काया के सुख दुःख समझाये,
सखा सारथी शरणागत के,
सदा प्रितपाल हरी,
हे दीन दयाल हरि,
हे कृष्ण गोपाल हरी,
हे दीन दयाल हरि ॥

श्याम के रंग में रंग गयी मीरा,
रस ख़ान तो रस की ख़ान हुई,
जग से आखे बंद करी तो,
सुरदास ने दरस किये,
मात यशोदा ब्रज नारी के,
माखन चोर हरी,
हे दीन दयाल हरि,
हे कृष्ण गोपाल हरी,
हे दीन दयाल हरि ॥

हे कृष्ण गोपाल हरि,
हे दीन दयाल हरि,
हे कृष्ण गोपाल हरी,
हे दीन दयाल हरि,
हे कृष्ण गोपाल हरी,
हे दीन दयाल हरि ॥

हे कृष्ण गोपाल हरि हे दीन दयाल हरि: भजन का गहन विश्लेषण

यह भजन श्रीकृष्ण की बहुआयामी महिमा को काव्यात्मक और भावनात्मक रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें कृष्ण को गोपाल, हरि और दीनदयाल के रूप में पुकारा गया है, जो न केवल भक्ति का प्रतीक है, बल्कि आध्यात्मिक चिंतन और व्यवहारिक जीवन के आदर्श भी है। इस व्याख्या में प्रत्येक पंक्ति के पीछे छिपे गूढ़ अर्थ को समझने का प्रयास करेंगे।


हे कृष्ण गोपाल हरि, हे दीन दयाल हरि

गहराई से व्याख्या:

“कृष्ण गोपाल” शब्द श्रीकृष्ण के उस स्वरूप का उल्लेख करता है, जब वे बाल्यकाल में ब्रजभूमि के गोप-गोपियों और गोधन के संरक्षक बने। गोपाल का अर्थ केवल गायों के रखवाले तक सीमित नहीं है; यह प्रकृति के संतुलन और जीवों की रक्षा के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।

“दीन दयाल” उनके करुणा और सहृदयता से भरे स्वरूप को उजागर करता है। दीन, यानी गरीब, असहाय और साधारण लोग, जिन पर कृष्ण ने अपनी असीम दया बरसाई। यह विशेषण उनके सार्वभौमिक प्रेम को दर्शाता है, जो बिना भेदभाव के सभी को अपनी छत्रछाया में लेता है।

आध्यात्मिक संदेश:

यह पंक्तियाँ हमें यह सिखाती हैं कि भक्ति का सार यह है कि भक्त अपने आराध्य को हर समय याद रखें, चाहे वह सुख में हों या दुःख में। “हरि” का उल्लेख यहाँ यह भी इंगित करता है कि प्रभु वह शक्ति हैं जो हमारे भीतर की अशुद्धियों और कष्टों को हर लेते हैं।


तुम करता तुम ही कारण, परम कृपाल हरी

गहराई से व्याख्या:

यह पंक्ति ब्रह्माण्ड के निर्माण और संचालन के पीछे के दैवीय कारण को इंगित करती है। “तुम करता” में यह सत्य छुपा है कि भगवान ही इस संसार के निर्माता हैं। “तुम ही कारण” का अर्थ है कि हर क्रिया और परिणाम की जड़ वही हैं।

“परम कृपाल” विशेषण भगवान के अनुग्रह को उजागर करता है। उनकी कृपा से ही अज्ञानी को ज्ञान प्राप्त होता है और सांसारिक दुखों से मुक्ति मिलती है। यह भजन उस अदृश्य शक्ति की ओर ध्यान आकर्षित करता है जो हमारे जीवन के हर पहलू को संचालित करती है।

आध्यात्मिक संदेश:

यहाँ यह संदेश है कि हर घटना में भगवान का हाथ होता है। जब हम इसे समझते हैं, तो हमारे जीवन में समर्पण और शांति आती है। यह पंक्ति कर्म और भाग्य के बीच संतुलन स्थापित करती है और यह बताती है कि भगवान की कृपा से सब संभव है।


रथ हाके रणभूमि में, और कर्म योग के मर्म बताये

गहराई से व्याख्या:

यहाँ महाभारत के प्रसंग को उद्धृत किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध भूमि में अर्जुन के रथ का संचालन किया, लेकिन यह केवल एक शारीरिक कर्तव्य नहीं था। यह उनके जीवन को दिशा देने का प्रतीक था।

“कर्म योग के मर्म बताये” का अर्थ है कि उन्होंने भगवद्गीता में अर्जुन को कर्मयोग का ज्ञान दिया। कर्मयोग का मर्म यह है कि हर व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से करना चाहिए। किसी भी कर्म का फल भगवान पर छोड़ देना चाहिए।

आध्यात्मिक संदेश:

यह घटना जीवन की कठिन परिस्थितियों में हमारा मार्गदर्शन करती है। भगवान का सारथी बनना यह दर्शाता है कि जब हम अपने जीवन को भगवान के चरणों में समर्पित कर देते हैं, तो वे हमारे लिए सही रास्ता चुनते हैं।


अजर अमर है परम तत्व यूँ, काया के सुख दुःख समझाये

गहराई से व्याख्या:

यह पंक्ति आत्मा और शरीर के बीच भेद को स्पष्ट करती है। “अजर अमर है परम तत्व” का तात्पर्य यह है कि आत्मा अविनाशी है। यह जन्म और मृत्यु के चक्र से परे है।

“काया के सुख दुःख समझाये” हमें इस बात का ज्ञान देता है कि शरीर का सुख और दुःख क्षणभंगुर हैं। यह केवल इस नश्वर शरीर के अनुभव हैं और आत्मा इनसे परे है।

आध्यात्मिक संदेश:

श्रीकृष्ण का यह उपदेश गीता का केंद्रीय विचार है। यह पंक्ति हमें सिखाती है कि हमें आत्मा के सत्य को पहचानना चाहिए और शरीर से जुड़े दुखों और सुखों के प्रति संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।


सखा सारथी शरणागत के, सदा प्रितपाल हरी

गहराई से व्याख्या:

“सखा” का अर्थ है मित्र। भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों के प्रति मित्रवत व्यवहार रखते हैं। महाभारत में उन्होंने अर्जुन के सारथी बनकर यह सिद्ध कर दिया कि वे अपने भक्तों के लिए किसी भी प्रकार का कर्तव्य निभाने को तत्पर रहते हैं।

“शरणागत के सदा प्रितपाल” यह इंगित करता है कि जो भी उनकी शरण में आता है, वे उसकी रक्षा करते हैं। यह भाव सच्ची भक्ति और समर्पण की महिमा को दर्शाता है।

आध्यात्मिक संदेश:

यह पंक्ति इस सत्य को उजागर करती है कि भगवान अपने भक्तों की सहायता कभी नहीं छोड़ते। जब हम पूर्ण विश्वास और समर्पण के साथ उनकी शरण में जाते हैं, तो वे हमारे जीवन के हर संकट का समाधान बनते हैं।


श्याम के रंग में रंग गयी मीरा

गहराई से व्याख्या:

मीरा बाई का संपूर्ण जीवन श्रीकृष्ण की भक्ति में विलीन था। “श्याम के रंग में रंग गयी” का अर्थ है कि उनका अस्तित्व श्रीकृष्ण के प्रेम में पूर्णतः लीन हो गया। उनका यह समर्पण सांसारिक बंधनों से परे था।

आध्यात्मिक संदेश:

मीरा का उदाहरण हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति में अपने अहंकार और व्यक्तिगत इच्छाओं को त्यागना होता है। जब भक्ति पूरी तरह से समर्पित होती है, तो भक्त और भगवान के बीच कोई भेद नहीं रहता।


रसखान तो रस की खान हुई

गहराई से व्याख्या:

“रसखान” सूफी कवि रसखान की ओर संकेत करता है, जिनका वास्तविक नाम सैयद इब्राहिम था। उन्होंने अपनी कविताओं में श्रीकृष्ण के प्रति असीम प्रेम व्यक्त किया। “रस की खान” का अर्थ है, उनकी कविताएँ भक्ति रस से परिपूर्ण थीं। वे कृष्ण भक्ति में इतने डूबे हुए थे कि उनके विचारों और कविताओं में केवल कृष्ण की महिमा ही प्रकट होती थी।

आध्यात्मिक संदेश:

रसखान का जीवन और उनकी काव्य रचनाएँ इस बात का प्रतीक हैं कि भक्ति जाति, धर्म या पृष्ठभूमि से परे है। उनका समर्पण सिखाता है कि भगवान के प्रति प्रेम में सब कुछ विलीन हो जाता है। सच्ची भक्ति वह है जो हृदय को भावपूर्ण आनंद से भर दे।


जग से आँखे बंद करी तो, सुरदास ने दरस किये

गहराई से व्याख्या:

सुरदास, जो जन्म से अंधे माने जाते हैं, ने अपनी दिव्य दृष्टि से श्रीकृष्ण के दर्शन किए। “जग से आँखे बंद करी” यह संकेत करता है कि उन्होंने संसार की मोह-माया और भौतिक वस्तुओं से ध्यान हटाकर अपने भीतर की आध्यात्मिकता पर ध्यान केंद्रित किया।

“दरस किये” का अर्थ है कि उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य दर्शन किया, जो भौतिक दृष्टि से परे था। उनकी भक्ति और कविताओं में इस दिव्यता का स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है।

आध्यात्मिक संदेश:

सुरदास का जीवन यह सिखाता है कि शारीरिक इंद्रियों की सीमाएँ आध्यात्मिक अनुभव को बाधित नहीं कर सकतीं। भक्ति के माध्यम से आत्मा में दिव्य दर्शन संभव है। यह पंक्ति आंतरिक आध्यात्मिकता और विश्वास को बल देती है।


मात यशोदा ब्रज नारी के, माखन चोर हरी

गहराई से व्याख्या:

यहाँ भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया गया है। “मात यशोदा ब्रज नारी के” इस बात को इंगित करता है कि श्रीकृष्ण बाल्यकाल में यशोदा माता और ब्रज की नारियों के सबसे प्रिय थे।

“माखन चोर हरी” उनकी चंचलता और आनंदमयी स्वभाव को दर्शाता है। माखन चुराना केवल एक लीला थी, लेकिन इसके पीछे का गहरा संदेश यह है कि भगवान हर भक्त का प्रेम (माखन) अपने आप में समेट लेते हैं।

आध्यात्मिक संदेश:

इस पंक्ति में भगवान की बाल सुलभता और दिव्यता का संतुलन दिखाया गया है। यह भक्तों को सिखाता है कि भगवान अपने सरल, मासूम और आनंदमयी स्वरूप में भी उपस्थित हैं। भक्ति केवल गूढ़ चिंतन तक सीमित नहीं है; यह भगवान के साथ खेल और आनंद का माध्यम भी है।


हे कृष्ण गोपाल हरि, हे दीन दयाल हरि (पुनरावृत्ति)

गहराई से व्याख्या:

भजन की यह पुनरावृत्ति हरि के प्रति बार-बार समर्पण और स्मरण का संकेत है। “हरि” का उल्लेख यह बताने के लिए किया गया है कि भगवान सभी दुखों का नाशक हैं।

आध्यात्मिक संदेश:

इस पुनरावृत्ति में भक्ति की स्थिरता और दृढ़ता का संदेश छिपा है। यह सिखाता है कि चाहे कितने भी विक्षेप हों, हमें अपने आराध्य की महिमा का स्मरण बार-बार करते रहना चाहिए। यह दोहराव मन और आत्मा में स्थायित्व लाता है।


समग्र निष्कर्ष

यह भजन केवल भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का गुणगान नहीं करता, बल्कि उनके जीवन, शिक्षाओं और लीलाओं के माध्यम से भक्त को आत्मबोध और भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

  1. कृष्ण का गोपाल रूप: यह प्रकृति और जीवन की सुरक्षा का प्रतीक है।
  2. गीता का संदेश: यह सिखाता है कि कर्मयोग का पालन करते हुए आत्मा की अनश्वरता को समझना चाहिए।
  3. भक्तों का प्रेम: मीरा, रसखान और सुरदास जैसे भक्तों के उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि सच्चा प्रेम और समर्पण भगवान से जुड़ने का सबसे सरल मार्ग है।
  4. बाल लीलाएँ: माखन चुराने जैसी लीलाओं में जीवन का आनंद और सादगी छिपी है, जो भगवान के साथ जुड़ाव को सरल और आनंदमय बनाती है।

भजन से शिक्षा

यह भजन हमें निम्नलिखित गहरी शिक्षाएँ प्रदान करता है:

  • भक्ति केवल भजन गाने तक सीमित नहीं है; यह भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और विश्वास का मार्ग है।
  • संसार के सुख-दुख क्षणिक हैं; केवल भगवान का नाम ही स्थायी है।
  • हमें अपने जीवन को कर्मयोग और प्रेमयोग के संतुलन में जीना चाहिए।
  • भगवान अपने भक्तों के लिए सखा, सारथी, और मार्गदर्शक बनते हैं, जब वे उनके प्रति पूर्ण समर्पण दिखाते हैं।

यह भजन हमें हर परिस्थिति में कृष्ण के प्रति अटूट विश्वास और निष्ठा बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

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